Wednesday, March 25, 2020

Happy New Year

आप सभी को विक्रम संवत २०७७ नव वर्ष हार्दिक शुभकामनाएं।
लेकिन

नए साल की पहचान क्या है? यह जानना बहुँत जरुरी है।
नया वर्ष तब होता है जब ईश्वर की बनाई प्रथ्वी पर कुछ नया हो।जैसे १२ महीनों में ६ ऋतुएँ होती है पहली ऋतु वसन्त मधु(मार्च) माधव(अप्रैल) अर्थात चैत्र से वैशाख तक।जब ६ ऋतुओं का चक्र पूर्ण होता है और वापस वसन्त ऋतु आती है जब प्रकृति का नवीनीकरण होता है फिर से उसको पुरे साल के लिए नया किया जाता है तैयार किया जाता है।मौसम नया होना,पेड़ों पर नए फल,फूल,पत्ते,जमीन में नयी फसल आना पूरी प्रकृति को नया जीवन दिया जाता है उस वक़्त आप नया साल मानें तब कह सकते है कि आप पढ़े लिखे है जानते समझते है,जब ईश्वर और उसकी प्रकृति कुछ नया नहीं कर करती तब आप किसी भी महीने को नया साल मानते हो।

 क्या आप ज्ञान के दुश्मन है? क्या ईश्वर और उसकी प्रकृति के नियमों के खिलाफ जा कर किसी भी 1 तारीख को या किसी महीने को नया साल मानते हो तो क्या नया साल हो जाएगा? नहीं आपके कहने से किसी तारीख को या किसी महीने में नया साल नहीं माना जाएगा, यह एक बेवकूफी सोच है,यह मनमानी है। प्रकृति को पसन्द करने वाले उसके नियम से ही से नया दिन नया साल तय करें।
जब वसन्त ऋतु में प्रकृति का नवीनीकरण हो रहा है तभी नया साल होता है और इस सच्चाई को आत्मसात करें।

सभी को पुनः नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

Wednesday, January 15, 2020

ओ३म्..
मकर (माघे) संक्रान्ति (माघी ) (माघ-विहु)को हार्दिक शुभकामना सहित....

मकर संक्रान्ति पर्वको महत्वलाई जानेर श्रद्धापूर्वक मनाऔं..!

मकर संक्रान्तिको पर्व प्रत्येक वर्ष माघ १गते देशभरि हरेकले आ-आफ्नै तरिकाले मनाउने गरिन्छ। आजभोलि हामीले पर्व त मनाउँछौं तर धेरैलाई कुनै पर्वको महत्व र त्यस सङ्ग जोडिएको घटनाहरुको ज्ञान हुँदैन। अतः त्यसैले हरेक पर्वको सबै पक्षको बारेमा संक्षेपमा जान्नु आवश्यक छ।
मकर संक्रान्ति पर्वको पहिलो महत्व हाम्रो सौर्यमण्डल तथा मकर राशि सङ्ग सम्बन्धित छ। हामीलाई थाहा छ कि पृथिवीको दुई प्रकारको गति हुन्छ- एक यो आफ्नो अक्षमा घुम्छ र दोस्रो गतिमा पृथ्वीले सूर्यको ओरिपरी परिक्रमा गर्दछ जुन एक वर्षमा पूरा हुन्छ। एउटा परिक्रमाको काल वा समयलाई सौर्यवर्ष भनिन्छ। पृथिवीले सूर्यको परिक्रमा गर्ने जुन पथ हुन्छ त्यो केहि लाम्चो (वृत्ताकार) हुन्छ।
पृथ्वी मकर संक्रान्तिका दिन देखि हिँडेर पुनः यहि स्थानमा आइपुग्ने तथा सूर्यको पूरा एक फन्को मार्ने मार्ग वा परिधिलाई ‘‘क्रान्तिवृत्त” भनिन्छ। वैदिक ज्योतिषि शास्त्र द्वारा यो क्रान्तिवृत्तका १२ भाग कल्पित गरिएको छ र ति १२ भागहरुको नाम ति स्थानहरुमा आकाशका नक्षत्रपुंज सङ्ग मिलेर बनेका केहि मिल्दा-जुल्दा आकृति भएका पदार्थहरुको नाममा राखिएको छ। ति १२ नाम हुन्- मेष, वृष, मिथुन, कर्कट, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ र मीन।
क्रान्तिवृतमा कल्पित प्रत्येक भाग तथा नक्षत्रपुंजहरुको आकृतिलाई “राशि” भनिन्छ। पृथिवी जब एक राशि बाट अर्को राशिमा प्रवेश तथा संक्रमण गर्दछ त्यस संक्रमणलाई नै “संक्रान्ति” भनिन्छ। लोकाचारमा पृथिवीको संक्रमणलाई सूर्यको संक्रमण भन्न थालिएको छ। मकर संक्रान्तिको अर्थ सूर्य मकर संक्रान्तिका दिन मकर राशिमा प्रवेश गर्दछ। ६ महीना सम्म सूर्य क्रान्तिवृत देखि उत्तर तिर देखिन्छ र ६ महिना सम्म दक्षिण तिर। यिनै ६ महिनाको अवधिको नाम ‘अयन’ हो।
सूर्य उत्तर तिर उदय हुने ६ महिनाको अवधिको नाम ‘उत्तरायण’ र दक्षिण तिर देखिने अवधिको नाम ‘दक्षिणायन’ हो। उत्तरायण कालमा सूर्य उत्तर तिर बाट उदय भएको जस्तो देखिन्छ र यसमा दिनको समय बढ्दै जान्छ र रातको समय घट्दै जान्छ। दक्षिणायनमा सूर्योदय क्रान्तिवृत्तको दक्षिण तिर बाट उदय भएको जस्तो दृष्टिगोचर हुन्छ र यसमा दिनको समयावधि घट्छ र रात्रिको अवधिमा वृद्धि हुन्छ।
सूर्य जब मकर राशिमा प्रवेश गर्दछ वा संक्रान्त हुन्छ तब उत्तरायणको आरम्भ हुन्छ र कर्कट राशिमा प्रवेश भए पछी दक्षिणायनको आरम्भ भएको मानिन्छ। यी दुई अयनहरुको अवधि ६/६ महिनाको हुन्छ। उत्तरायणमा दिन लामा र रात छोटा हुनाले पृथिवीमा प्रकाशको अधिकता हुन्छ त्यसैले यो उत्तरायण कालको महत्व दक्षिणायन भन्दा अधिक मानिएको हो।
उत्तरायणको महत्वको आरम्भ मकर संक्रान्ति देखि हुने भएकोले मकर संक्रान्ति (माघ १ गते) को दिनलाई अधिक महत्वपूर्ण मानिन्छ र यसलाई पर्वको रूपमा मनाइने प्रथा परापूर्व काल देखि चली आएको छ। यो पनि जानकारी दिहालौं- ज्योतिष शास्त्रका विद्वानहरु भन्दछन् कि उत्तरायणको आरम्भ त मकर संकान्तिका दिन भन्दा पहिले देखि नै हुन्छ तर मकर संक्रान्तिको पर्वमा नै दुवै पर्व एक साथ मनाइने परम्परा चलिआएको छ। भविष्यमा यिनलाई अलग अलग तिथिमा मनाउनका लागि विचार पनि गर्न सकिने छ।
चाहे जेहोस्, यो पर्व मनाउनुको मुख्य उद्देश्य मकर संक्रान्तिको ज्ञान र ६ महिने उत्तरायणको आरम्भ सङ्ग छ जसबाट हाम्रा पूर्वजहरुको ज्योतिष विषयक ज्ञान र रुचि सङ्ग परिचित हुन सकियोस्।
क्रमशः...

Wednesday, December 4, 2019

Tahrrussh Gamia(तहर्रुश गेमिया) किसे कहते है जानिए-

यहां ‘तहर्रुश गेमिया’ खेल के नाम पर लड़कियों से किया जाता है गैंग रेप अरब देशों में ‘तहर्रुश गेमिया’ नाम का एक खेल खेला जाता है।

 इस खेल का नाम सुनते ही यह सामान्य बच्चों के खेल की तरह ही लगता है लेकिन इस खेल की पीछे की हकीकत हैरान करने वाली है। परंपरा के नाम पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न सदियों से चला आ रहा है। आज के मॉडर्न समाज में भी कुछ ऐसे देश हैं जहां धर्म और परंपरा के नाम पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीडन हो रहा है। अरब जैसे कुछ देश ऐसे हैं जहां आज भी यह सब कुछ होता है। अरब देशों में ‘तहर्रुश गेमिया’ नाम का एक खेल खेला जाता है। इस खेल का नाम सुनते ही यह सामान्य बच्चों के खेल की तरह ही लगता है लेकिन इस खेल की पीछे की हकीकत हैरान करने वाली है। सार्वजनिक स्थलों पर खेले जाने वाले इस खेल में एक अकेली लड़की के साथ बाक़ायदा सामूहिक बलात्कार किया जाता है। ये एक ऐसी घिनौना परंपरा है जो अरब देशों से निकलर यूरोप में भी पैर पसार रही है। क्या है ‘तहर्रुश गेमिया’? ‘तहर्रुश गेमिया’ अरबी शब्द है जिसका मतलब होता है ‘संयुक्त रुप से छेड़छाड़’। इस खेल में युवा सार्वजनिक स्थान पर अकेली लड़की को निशाना बनाते हैं। झुंड में ये लड़के या तो लड़की के साथ शारीरिक रुप से छेड़छाड़ करते हैं या फिर उसका बलात्कार करते हैं। कैसे खेला जाता है ‘तहर्रुश गेमिया’? सबसे पहले लड़के एक घेरा बनाकर अकेली लड़की को घेर लेते हैं फिर अंदर वाले घेरे में मौजूद लड़के लड़की का यौन शोषण करते हैं जबकि बाहरी घेरे वाले लड़के भीड़ को दूर रखते हैं। ख़ौफ़नाक ‘तहर्रुश गेमिया’,की रिपोर्टर भी हुई थी शिकार 2011 में मिस्र में पहली बार ये घिनौना खेल देखा गया था। साउथ अफ़्रीका की रिपोर्टर लारा लोगन काहिरा के तहरीर स्क्वैयर से रिपोर्टिंग कर रही थी तभी लड़को के एक झुंड ने उन्हें घेर लिया और उनसे छेड़छाड़ की। लारा ने इस घटना के काफी बाद बताया हुए कहा था , “अचानक इसके पहले कि मुझे कुछ समझ में आए कुछ लोगों ने मुझे घेर लिया और मेरे शरीर पर जगह जगह छूने लगे। वो एक-दो नही की सारे थे। ये ऐसा सिलसिला था जो लगातार चल रहा था। ‘तहर्रुश गेमिया’ चला अरब से यूरोप की ओर ये अमानवीय केल अब यूरोप में जड़े जमाने लगा है। नये साल पर जर्मनी में कई जगह ऐसी घटनाओं के होनी की ख़बर मिली है। बताया जाता है कि ये लोग जर्मनी के नहीं किसी अन्य देश के थे। पुलिस को अंदेशा है कि ये ‘तहर्रुश गेमिया’ ही था जो अब यहां भी शुरु होगया है। ये एक धटना कोलोन की है जहां भीड़ पर पहले पटाखे छोड़े गये फिर नशे में धुत्त अरब या उत्तरी अफ़्रीकी लोगों ने महिलाओं के साथ बदतमीज़ी की। आश्चर्य की हात ये है कि पुलिस मूकदर्शक बनकर तमाशा देखती रही। उसका कहना है कि भीड़ को संभालने के लिये पुलिस बल नाकाफी था। देखें किस तरह खेला जाता है ये खेल

 यह खेल  भारत में भी धीरे धीरे अपनी पैर  जमा  रहा है | कर्णाटक के बंगलोर में यह एक बार खेली जा चुकी है | हो सकता  है कहीं  और भी भारत  में खेली गयी हो जिस बारे में हमें  ना मालुम हो |

Saturday, November 30, 2019

अलाउद्दीन की काली करतूत।

“हिंदुओं का दमन कर अलाउद्दीन खिलजी ने बढ़ाई इस्लाम की इज़्ज़त”- जानकार (भाग 20)

विजय मनोहर तिवारी

हिंदुओं का दमन पूरी ताकत से करने के लिए इल्तुतमिश के 75 साल बाद अलाउद्दीन खिलजी ने कमर कसी। ऐसी कठाेर नीतियाँ बनाई गईं और उनपर बहुत सख्ती से अमल किया, जिनके बारे में जानकर रूह कांप जाए। ऐसे फैसले लिए गए, जिनसे काफिरों को जहाँ तक मुमकिन हो खत्म किया जा सके।

अब तक हमने उन्हें दिल्ली पर कब्ज़ा जमाने के बाद के इन 100 सालों में हिंदू राज्यों में जमकर लूटपाट और कत्लेआम मचाते हुए लगातार देखा, लेकिन अब हिंदुओं को हर हाल में मटियामेट करना ही इस्लामी हुकूमत की पहली प्राथमिकता थी।

इसके लिए इस्लाम के मजहबी जानकारों की भी राय ली गई और आलिमों ने जो तरीके खिलजी को बताए, उनके ब्यौरे इस्लाम का एक अलग गौरतलब चेहरा उजागर करते हैं। खिलजी और उसके समय के मजहबी लोग इस्लाम की कैसी व्याख्या कर रहे थे, दिल थामकर इतिहास से गायब भारत की बदकिस्मती की वजह बने इन नृशंस तौर-तरीकों को जरा आप भी देखिए।

दिल्ली में अपने खिलाफ लगातार सिर उठा रहे विरोधियों से परेशान अलाउद्दीन खिलजी ने सबसे पहले अपने ताकतवर अमीरों, मलिकों और दरबार के अहम ओहदों पर बैठे अपने ही जैसे शातिर और बेरहम तुर्कों की सारी संपत्तियाँ जब्त करा लीं।

उनके आपस में मेलजोल, एक-दूसरे के घरों में आने-जाने, महफिलों, दावतों और रिश्तेदारी करने पर रोक लगा दी। शराबबंदी की गई। लोगों को सार्वजनिक रूप से पिटवाया गया। दबदबा यहाँ तक कायम हुआ कि डरे हुए दरबारी एक-दूसरे से इशारों में बात करने लगे।

कैदियों को मारने के लिए कुएँ खुदवाए गए। इन कुओं में लोगों को ज़िंदा गिरा दिया जाता था। एक कुएँ में कई लोग फेंक दिए जाते थे, जो एक दूसरे पर दबकर मर जाते थे। कैद के कुओं ने एक अलग खौफ पैदा कर दिया था। यह दिल्ली में हो रहा था।

कट्‌टर सुन्नी मुसलमानों को हुकूमत में सब तरह के हक हासिल करने का प्रबल पक्षधर और हमें उस दौर की पल-पल की खबर दे रहा जियाउद्दीन बरनी हिंदुओं की बारी आने पर सबसे ज्यादा जोश में दिखाई देता है। उसने ऐसे हर मौके की तफसीलें हमारे लिए दर्ज की हैं। हिंदुओं के खिलाफ दिल्ली में लिए जा रहे इस उच्च स्तरीय मजहबी और सियासी फैसले पर सबसे पहले यह ब्रेकिंग न्यूज़ जियाउद्दीन बरनी ही दे रहा है–

“साज़िशों को दबाने के हुक्म जारी करने के बाद सुलतान ने बुद्धिमानों से वह कानून बनाने को कहा, जिनके जरिए हिंदुओं को दबाया जा सके। हिंदुओं के पास इतना धन भी न बचे कि वे घोड़े पर सवार हो सकें, हथियार रख सकें, अच्छे कपड़े पहन सकें और आराम से जिंदगी गुज़ार सकें।“

दिल्ली और दिल्ली के चारों तरफ फैले प्राचीन हिंदू राज्यों में तब भी बहुसंख्यक आबादी हिंदुओं की थी। खिलजी ने तय किया कि उसके इलाके में किसान अपनी पैदावार का आधा हिस्सा उसे देंगे। दिल्ली के आसपास के देहातों, कस्बों के अलावा बयाना, झायन, पालम, देपालपुर, लाहौर, सामाना, रेवाड़ी, नागौर, कड़ा, अमरोहा, बंदायू और कटिहर पर कब्ज़ा जमा चुके मुस्लिम तुर्कों के मातहत कठोरता से कमाई का आधा टैक्स के रूप में वसूली का नेटवर्क तैयार किया गया।

इस नेटवर्क में ऊपर से नीचे तक तैनात आमिल, मुंशी, मुत्सर्रिफ और पटवारियों पर हिसाब-किताब की सख्ती बैठा दी गई ताकि वसूली बेरहमी से हो और पूरा माल खिलजी के खजाने में आए। एक जीतल की हेरफेर भी इनमें से किसी को भी कैदखाने में डलवा सकती थी।

यह ध्यान रखें कि निचले पदों पर वसूली करने वाले हों या दूर गाँव-कस्बों में मनमाना खिराज देने वाले, दोनों ही ज्यादातर हिंदू ही थे और इनमें से किसी को बचने का कोई उपाय नहीं रहा। यह आर्थिक रूप से हिंदुओं को मजबूर बनाने का पहला योजनाबद्ध प्रहार था। बरनी बता रहा है-

“यह काम इस ढंग से किया गया कि चौधरियों, खूतों और मुकद्दमों में विरोध और बगावत बंद हो गई। उनका घोड़े पर सवार होना, हथियार रखना, अच्छे कपड़े और बेहतर खानपान सब बंद हो गया। खिराज अदा करने के बारे में उन्हें इतना आज्ञाकारी बना दिया गया कि दीवान का एक चपरासी भी कस्बों के बीसियों चौधरियों और मुकद्दमों को एक रस्सी में बांधकर खिराज चुकाने के लिए मारता-पीटता था।

हिंदुओं के लिए अब सिर उठाना मुमकिन नहीं था। हिंदुओं के घरों में सोने, चांदी, तनके, जीतल और धन-संपदा का नामोनिशान भी नहीं रहने दिया गया, क्योंकि इसी के बूते लोग साजिश और बगावत करते हैं। वे इस हद तक गरीब बना दिए गए कि खूतों और मुकद्दमों के घरों की औरतें मुसलमानों के घराें में जाकर काम करने लगीं, मजदूरी पाने लगीं।”

दस्तावेजों में दर्ज यह जानकारी भी जानने योग्य है कि अलाउद्दीन खिलजी को किसी विद्या का कोई ज्ञान नहीं था। वह कभी आलिमों के साथ भी उठता-बैठता नहीं था। हद दरजे का जाहिल और पत्थर दिल तो वह था ही, जिसने अपने चाचा, अपने भांजों और भतीजों की गर्दनें उड़वाईं थीं।

इस्लाम कुबूल करने वाले मुगलों और उनके औरतों-बच्चों तक के कत्लेआम किए थे। दानिशमंद उसके पास कम ही फटकते थे। केवल काजी जियाउद्दीन बयाना, मौलाना जहीर लंग और मौलाना मशीद कुहरानी दरबार के अमीरों के साथ दस्तरख्वान पर बैठने के लिए नियुक्त थे। अलाउद्दीन के सामने सिर्फ काजी मुगीसुद्दीन बयाना आया-जाया करता था।

हिंदुओं के दमन के लिए बनाए जा रहे सख्त कानूनों के समय अलाउद्दीन और काजी मुगीस के बीच सीधी निर्णायक बातचीत होती है। यह हमें इल्तुतमिश के समय दरबार में हिंदुओं को कुचलने का प्रस्ताव लेकर आए इस्लामी विद्वानों की उस बहस की याद दिलाती है, जब इल्तुतमिश के वज़ीर ने बड़ी चतुराई से उस मुद्दे को टाल दिया था।

अब एक बार फिर हिंदुओं को बाकायदा नीतिगत तरीके से निपटाने पर बहस हुई। आजाद भारत के सेक्युलर इतिहास से विलुप्त कर दिए गए ये ब्यौरे अमनपसंद और सहनशील भारतीयों की नींद उड़ाने वाले हैं। आइए सीधे चलते हैं दिल्ली, जहाँ अलाउद्दीन खिलजी और काज़ी मुगीस हिंदुओं की तकदीर का फैसला करने के लिए एक उच्चस्तरीय बैठक कर रहे हैं…

दिल्ली से लाइव-

1. हिंदुओं को हर कहीं बेइज्जत करने का फैसला
हम उनके मुँह में थूकें और वे उफ भी न करें…

अलाउद्दीन ने काज़ी साहब के सामने पहला मसला यही रखा- “हिंदुओं से खिराज वसूलने पर शरिया की राय क्या है?’

काज़ी ने दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए फरमाया- “शरिया कहती है कि जब कर वसूल करने वाला उससे चांदी मांगे तो वह बिना सोचे-विचारे और बड़ी इज्ज़त से सोना अदा कर दे। अगर मुहसिल (कर वसूल करने वाला) उसके मुँह में थूकना चाहे तो वह बिना किसी आपत्ति के मुँह खोल दे, जिससे वह उसके मुंह में थूक सके। उस हालत में भी वह मुहसिल के हुक्म का पालन करता रहे।

इस तरह थूकने, बेइज्ज़ती और सख्ती करने का मकसद यह है कि जिम्मी का अत्यधिक आज्ञाकारी होना साबित होता रहे। इस्लाम की इज्ज़त बढ़ाना बेहद ज़रूरी है। दीन को बेइज्ज़त करना बहुत बुरा है। खुदा उनको बेइज्ज़त करने के बारे में यही कहता है।

खासकर हिंदुओं को बेइज्जत करना दीन के लिए बेहद ज़रूरी है। इसकी वजह यह है कि वे मुस्तफा के दुश्मनों में सबसे बड़े दुश्मन हैं। मुस्तफा अलैहिस्सलाम ने हिंदुओं के बारे में यह हुक्म दिया है कि उनको कत्ल कराया जाए, उनकी धन-दौलत लूट ली जाए, उन्हें कैद किया जाए। या तो उनसे इस्लाम कुबूल कराया जाए या उनको मार डाला जाए और उनकी धन-संपत्ति छीन ली जाए।“

काज़ी ने थोड़ा रुककर अपनी बात जारी रखी- “हम इमामे-आजम को मानने वाले हैं और उनके अलावा किसी ने भी हिंदुओं से जजिया वसूलने का हुक्म नहीं दिया है। दूसरे मजहब वालों ने इस तरह की कोई रवायत नहीं लिखी है। उनके आलिम हिंदुओं के बारे में सिर्फ यह आदेश देते हैं कि या तो उनको कत्ल कर दिया जाए या उनसे इस्लाम कुबूल कराया जाए।“

काज़ी की राय सुनकर अलाउद्दीन के चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गई। वह काज़ी से कहता है- “तूने जो कुछ कहा, उसके बारे में मुझे कुछ मालूम नहीं है। लेकिन मुझे यह पता है कि खूत और मुकद्दम शानदार घोड़ों पर सवार होते हैं। अच्छे कपड़े पहनते हैं। ईरानी धनुष से तीर चलाते हैं। शिकार करते हैं।

खिराज, जजिया और चराई का एक जीतल भी खुद नहीं देते। खूती का पारिश्रमिक अलग से देहातों से वसूलते हैं। महफिलें करते हैं, शराब पीते हैं और कई तो बुलाने पर भी दीवान में हाजिर नहीं होते। मुहसिलों की परवाह नहीं करते।

मुझे इस बात पर बड़ा गुस्सा आया। मैंने सोचा कि मैं दूसरे इलाकों पर कब्ज़ा जमाने की सोचता रहता हूँ और मेरी इकलीम में 100 कोस के भीतर मेरे हुक्म नहीं माने जाते। तब मैंने ऐसा किया कि मेरे हुक्म से सभी चूहे बिलों में घुस गए। इस समय तू भी कहता है कि शरिया के आदेश भी इस बारे में यही कहते हैं कि हिंदुओं को ज्यादा से ज्यादा आज्ञाकारी बनाया जाए।“

अलाउद्दीन इतना कहकर रुका। उसने एक गहरी साँस ली और फिर तनकर बोला- “ऐ मौलाए-मुगीस तू बड़ा दानिशमंद है लेकिन तुझे कोई तजुर्बा नहीं है। मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ लेकिन मुझे तजुर्बा बड़ा है।

तू समझ ले कि हिंदू उस समय तक मुसलमान का आज्ञाकारी नहीं होता जब तक वह पूरी तरह गरीब और दरिद्र नहीं हो जाता। मैंने यह हुक्म दिया है कि अवाम के पास सिर्फ इतना ही धन रहने दिया जाए जिससे वह हर साल खेती, दूध और मट्‌ठे के लिए ही काफी हो और अधिक धन-संपत्ति इकट्‌ठी न कर पाएँ।“

यह बातचीत दो दिन चली। इसमें अलाउद्दीन ने देवगिरि में लूट से हासिल बेहिसाब संपत्ति की माल्कियत के बारे में सवाल किए। अपने हरम की औरतों और अपने बेटों पर होने वाले खर्चे का मसला भी रखा। दूसरे दिन जब काजी बैठक में आया तब वह कहता है-

“काज़ी मुगीस, मैंने कोई किताब नहीं पढ़ी और न ही पढ़ा-लिखा हूँ। मैं जाहिल हूँ। अलहमदो, कुलहो अल्लाह और दुआए-कुनूत के सिवा कुछ नहीं पढ़ सकता। लेकिन कई पीढ़ियों से मुसलमान हूँ और मुसलमान का बेटा हूँ।“

2. हिंदुओं की दुर्गति पर हदीस के जानकार ने कहा कि खिलजी को नबियों के बीच जगह मिलेगी…

अलाउद्दीन खिलजी ने जिस साल काज़ी मुगीस से हिंदुओं के भविष्य के बारे में यह खुली बात की, उसी समय इस्लाम में हदीस का एक नामी जानकार मौलाना शम्सुद्दीन तुर्क हदीस की 400 किताबों के साथ मुलतान पहुँचा। जब उसने सुना कि अलाउद्दीन नमाज़ नहीं पढ़ता और जुमे की नमाज़ में भी ज्यादातर गैरहाज़िर रहता है तो वह मुल्तान से आगे नहीं बढ़ा और शेखुल इस्लाम सद्रुद्दीन के साहबजादे शेख शम्सुद्दीन फजलुल्लाह का चेला बन जाता है।

वहीं से उसने हदीस की एक किताब में अलाउद्दीन की तारीफ लिखकर दिल्ली भेजी। उसने अलाउद्दीन की शान में क्या लिखा है, वह देखिए-

“मैं देहली के निवासियों की सेवा के इरादे से आया था। मेरा ख्याल था कि मैं खुदा और मुस्तफा के लिए हदीस के ज्ञान का देहली में प्रचार करूँ। लेकिन जब मैंने यह सुना कि बादशाह नमाज़ नहीं पढ़ता, जुमे में हाज़िर नहीं होता तो मैं मुल्तान से ही लौट जाता हूँ।

लेकिन मैंने बादशाह की दो-तीन काबिलियत के बारे में सुना है जो किसी भी मजहबी बादशाह में होनी चाहिए। उन काबिलियत में से एक यह है कि हिंदुओं को बेइज्ज़त, पतित, शर्मसार और गरीब बना दिया गया है। मैंने सुना कि हिंदुओं की औरतें और बच्चे मुसलमानों के दरवाजों पर आकर भीख मांगा करते हैं।

ऐ इस्लाम के बादशाह, तेरी यह धर्मनिष्ठता तारीफ के काबिल है। तू मुहम्मद के मजहब की खूब हिफाज़त कर रहा है। अगर इसी आचरण के कारण तेरे सभी पापों में से जो आकाश से पाताल तक के पापों से भी ज्यादा हों, चिड़िया के एक पंख के बराबर भी बख्शे जाने से रह जाएँ तो कल कयामत में तू मेरा दामन थाम लेना।’

हदीसों का यह जानकार अलाउद्दीन की तारीफ में इस हद तक गया है कि वह आगे लिखता है- “ऐ बादशाह तू बधाई का पात्र है। तुझे नबियों के बीच जगह मिलेगी।“

यह इस्लामी दुनिया का सर्वोच्च सम्मान देने जैसा है कि किसी को नबियों के बीच और उनके बराबर मान लिया जाए और ऐसा इस्लाम की शान में चार चांद लगाने वाला इंसानियत का कोई बड़ा कारनामा कर दिखाने के बदले में नहीं किया जा रहा है।

खिलजी की इज्ज़तअफज़ाई हिंदुओं के क्रूर दमन के लिए हो रही है। दिल्ली पर कब्ज़ा जमाने के बाद अब चारों तरफ हिंदुस्तान को मटियामेट कर रहे खिलजी को इस्लाम की इज्जत बढ़ाने वाले एक महान सुलतान के रूप में मान्यता मिल रही है। जबकि वह न कुरान पढ़ता, न नमाज़ को जाता।

यह भी देखिए कि उसने अपने खूंखार और शैतानी तौर-तरीकों से किसी को नहीं बख्शा। उसने मुसलमानों को भी थोक में मारा। उनके घर के औरतों-बच्चों को पहली बार दिल्ली में सरेआम कत्ल किया।

आज के पाकिस्तान, बांग्लादेश और बचे-खुचे हिंदुस्तान में क्रूर इस्लामी हमलावरों के साथ अपनी बल्दियतें जोड़ने वाले और असल इतिहास से पूरी तरह बेखबर आज के सारे मुसलमानों के लिए ये दिल दुखाने वाले ब्यौरे इस बात का अवसर देते हैं कि वे इस्लाम की सही व्याख्या कुरान और हदीस में मौजूद तथ्यों के साथ समाज के सामने प्रस्तुत करें।

क्या सिंहासन पर बैठा कोई अपराधी ऐसे घृणित और आपराधिक कारनामों के बूते पर नबियों के बीच जगह पा सकता है? ये क्या चल रहा है? और इससे किसको फिक्र होनी चाहिए? यह सिर्फ मुसलमानों की चिंता के विषय हैं। एक नया मजहब किस तरह के लोगों के हाथों में चला गया? वे किस रास्ते पर इसे ले गए हैं? क्या वे ही सही हैं और अमन की अपीलें ढकोसला हैं?

जियाउद्दीन बरनी ने मलिक करीबेग के जरिए दरबार के ये गोपनीय ब्यौरे दर्ज किए और यह रिपोर्टें हम तक आई। यह 14वीं सदी की शुरुआत थी। नए-नए इलाकों को रौंद रही दिल्ली के लुटेरों की फौजें खुद को ‘इस्लाम की सेना’ कहती थीं।

हिंदुस्तान के नए-नए इलाकों में पहली पीढ़ी मुसलमानों और उनके तौर-तरीकों से रूबरू हो रही थी। 100 साल से लाहौर, दिल्ली, अवध, कन्नौज, बिहार और बंगाल में कोहराम मचा हुआ था। उसके पहले महमूद गज़नवी सिर्फ लगातार लूटपाट के लिए आया करता था। इस्लाम से यह दो सौ साल का संपर्क और परिचय था। यानी आठ पीढ़ियों से यह नई धारा बह रही थी।

आज से 700 साल पहले गंगा तो अपनी जगह वैसी ही थी, लेकिन उसमें जो मिल रहा था वह इस्लाम के नाम पर जहरीला और जानलेवा नस्ली भेदभाव, हिंदुओं के खूनखराबे का भयावह गटर था।

अगर उस दौर से सीधे 700 साल बाद के समय में छलांग लगाकर देखें तो हिंदुस्तान का एक अलग चित्र सामने देखते हैं। मजहब के नाम पर 1947 में पाकिस्तान और फिर बांग्लादेश बनने के बाद बचे-खुचे भारत में हम 1990 में कश्मीर से पंडितों का वैसा ही दमन देखते हैं और मुल्क के बाकी हिस्से में गंगा-जमुनी राग का शोर सुनते हैं। हिंदुओं के लगातार दमन और सदियों तक चले धर्मांतरण के बावजूद अगर टुकड़ा-टुकड़ा होकर भी कुछ बचा रह गया है तो यह कुदरत का करिश्मा ही है। अल्लाह की मेहरबानी है। शुक्र है।

Wednesday, November 27, 2019

यज्ञ की विशेषता।


आप सभी का स्वागत हैं।

मैं योगीराज आप सभी का अपने ब्लॉग पर स्वागत करता हूँ मेरा उद्देश्य जन जन को सही जानकारी देना है उसी उद्देश्य से मैंने यह ब्लॉग बनाया है। आप सभी का पुनः स्वागत है आप सभी का अभिनन्दन है!

🌿🌼 नवसंवत्सर, विक्रम सम्वत- २०८२- संवत्सर का प्रथम मास - चैत्रमास 🌼🌿

  🌿🌼 नवसंवत्सर, विक्रम सम्वत- २०८२- संवत्सर का प्रथम मास - चैत्रमास 🌼🌿 चैत्रमास संवत्सर का प्रथम मास है। सृष्टि के आरम्भमें चन्द्रमा चित...