Wednesday, June 17, 2020

उत्तर दिशा में सिर करके क्यों नहीं सोना चाहिए।

नमस्ते दोस्तों

उत्तर दिशा में सिर करके क्यों नहीं सोना चाहिए?

आजकल लोग बिना समझें अपनी किसी भी बात को अन्धविश्वास कह देते है और मनमर्जी की बात जो किसी भी सत्य और प्रमाण पर खरी नहीं होती उसको सही तरीका मानते है।

चलिए जानते है आखिर इसके पीछे क्या विज्ञान छुपा है।

पृथ्वी के दो ध्रुव है उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव।
इन ध्रुवों में चुम्बकीय प्रभाव रहता है।
जो स्थान जिस ध्रुव के नजदीक अर्थात प्रभाव में होता है वहाँ के लोगों को उस ध्रुव की और सिर करके नहीं सोना चाहिए।

जैसे भारत उत्तरी ध्रुव के प्रभाव क्षेत्र में आता है तो भारत के लोगों को उत्तर दिशा में सिर करके नहीं सोना चाहिए। क्योंकि उत्तरी ध्रुव का चुम्बकीय प्रभाव उसके शरीर के रक्त प्रवाह पर पड़ता है जैसे उत्तर दिशा में सर करके सोने से रक्त प्रवाह सिर की तरफ बढ़ जाता है और सिर में बहुत बारीक कोशिकाएँ होती है और रक्त के असामान्य प्रवाह से मानसिक रोग हो सकता है जैसे अत्यधिक विचार आना,मन विचलित होना,नींद न आने की समस्या यहाँ तक की मौत तक हो सकती है। उत्तर दिशा में सोना यह बेहद नुकसान देह है।

यह जानकारी आपको कैसी लगी कमेंट्स करके जरूर बताएं।

धन्यवाद।

Monday, June 15, 2020

हनुमान जी बन्दर नहीं थे, वाल्मीकि रामायण से प्रमाण।

नमस्ते दोस्तों,

मैं योगीराज सिंह,

आज हम जानेंगे क्या हनुमान जी बन्दर थे इसके प्रमाण वाल्मीकि रामायण से ही देंगें। कि हनुमान जी बन्दर नहीं थे।

आइये वाल्मीकि रामायण में देखते है हनुमान जी को क्या कहा गया है उनके क्या गुण कहें गए है।

पहला प्रमाण 

वाल्मीकि रामायण में हनुमान जी को वानर लिखा है। वानर शब्द का अर्थ होता है वन में रहने वाले नर(मनुष्य)।

दूसरा प्रमाण
वाल्मीकि रामायण में जब हनुमान जी श्री राम से मिलते है तब श्री राम छोटे भाई लक्षण से कहते है। 

जिसे ऋग्वेद की शिक्षा नहीं मिली ,जिसको यजुर्वेद नहीं किया और जिसको सामवेद का ज्ञान नहीं वो इस प्रकार सुन्दर भाषा में वार्तालाप नहीं कर सकता। - वाल्मीकि रामायण किष्किंधा काण्ड तृतीय सर्ग श्लोक २८ ।

क्या कोई बन्दर वेदों का ज्ञाता हो सकता है। बिलकुल नहीं।
अफ़सोस होता है कि वाल्मीकि रामायण के प्रमाणों से उलट कई पाखण्डी जो मनगढंत कहानी बनाते है और अर्थ का अनर्थ करते है।
उन्होंने वेदों के विद्वान हनुमान जी को बन्दर समझ लिया। मगर रामायण में हनुमान जी को बन्दर बताया ही नहीं। बल्कि वानर कहा गया है।

यह जानकारी आपको कैसी लगी जरूर बताएँ।

धन्यवाद।



Thursday, June 11, 2020

Netflix का हिन्दू विरोधी एजेंडा चालू है,

नमस्ते दोस्तों,

Netflix का हिन्दू विरोधी एजेंडा चालू है।
हाल ही के दिनों में एक फ़िल्म जिसका नाम छिप्पा है
जिसका लेखक सफदार रहमान है
और डायरेक्टर भी यही सफदार रहमान है।
इस फिल्म में हिन्दुओं के आदर्श श्रीराम भक्त हनुमान जी के लिए अनर्गल बत्तमीजी की गयी।
उनका अपमान किया गया। आये दिन हिन्दुओं को और उनके देवीदेवताओं के खिलाफ बोलने का जो फैशन चलाने का ठेका ले लिया है इसका परिणाम बहुत भयंकर होगा।
इस फिल्म में एक वाक़्यात बताया गया है कि हनुमान जी को एक औरत थप्पड़ लगाती है और हनुमान जी दुम दबाकर भाग जाते है।
हिन्दुओं के आदर्शों को के बारे में,देवताओं के बारे में मज़ाक करना एक फैशन हो गया जिसका अंत अब करना चाहिए।
दोस्तों यह वीडियो शेयर करें क्योंकि हिन्दुओं को जानकारी ही नहीं है कि हिंदुओं के खिलाफ कितना बड़ा षड्यंत्र रचा जा रहा है।

धन्यवाद 
सनातन धर्म की जय हो।

Wednesday, May 27, 2020

कथा जिहाद-

कथा जिहाद- कई कथावाचकों द्वारा 
व्यासपीठ पर बैठ कर सनातन विरोधी स्वर सुनते आप देख सकते है यह संख्या एक दो नहीं बल्कि सैंकड़ों में है। कई कथा वाचकों के ऐसा बोलने की कई वजह हो सकती है। जैसे
1- धर्म का ज्ञान नहीं होना। मजहब,पंथ और धर्म में फर्क पता न होना।
2- अपने आपको सेक्यूलर दिखाने के लिए अनर्गल ढोंग करना।
3- धर्म को पैसों की खातिर दाव पर लगा देना।
4- सनातन धर्म को मानने वालों को धर्म से दूर अधर्म और मजहब की और धकेलना।
5- सनातन धर्म को कम समझना और उसके हिस्से होने की हीन भावना।

यह कथावाचकों की गलती से या जानबूझकर किया जाने वाला अन्याय सनातन धर्म को मानने वालों की कब्र खोदने के लिए काफी है। 
चित्रलेखा जी कहती है नमाज़ की आवाज़ सुनाई दे तो कथा रोक कर उनके अल्लाह को प्रणाम करें क्या फर्क पड़ता है।
मुरारी बापू कहते है कि अल्लाह की बंदगी करो।
कलमा पढ़वा रहे व्यासपीठ से।
कई कथावाचक भारत पर आक्रमण करने वाले औरंगज़ेब की तारीफों के पुल बाँध रहे है वो औरंगज़ेब जिसने भारत पर हमला किया,भारत की स्त्रियों के बलात्कार किये,मंडी लगवाई,बेचा गया।
अकबर जैसे बलात्कारी,लुटेरों की तारीफ करने में लगे है।
इनकी यह नासमझी सनातन धर्म की लड़कियों को इस्लाम की तरफ लव जिहाद की ओर धकेल रही है। 
सनातनियों का अहित हो रहा है इसमें। भारत के साथ,सनातन धर्म के साथ,और भारत के इतिहास के साथ ग़द्दारी है ऐसा करना।

अंत में यही कहूँगा ऐसे भ्रमित करने वाले कथावाचकों का विरोध करें और उनको धर्म गुरु मानने की गलती न करें।

आपकी क्या राय है आप कमेंट्स बॉक्स में जरूर दें। 
धन्यवाद

Sunday, May 10, 2020

Mother's day का इतिहास और परम्परा!

Mother's day की शुरूवात कैसे हुई। जानिए-

यूरोप में प्लेटो के समय से पहले ही एक परम्परा चलती आ रही है कि वहाँ की महिलाएँ बच्चों को मिशनरी में छोड़ आती थी अनाथ हुए बच्चों को मिशनरी सिस्टर्स पाला करती है। तो यूरोप की महिलाएँ साल में किसी एक दिन के लिए उन मिशनरी में जाती है और उन बच्चों को स्तनपान कराती थी।और उनको एक दिन के लिए माँ बनने की फॉर्मेलिटी करती है और उस दिन को वो महिलाएँ mother's day मनाती है। यही mother's day का इतिहास और परंपरा है।

 वास्तविकता यही है कि शादी के बाद स्त्री और पुरुष का खुद का पूर्ण अंश या सम्मान नहीं होता बल्कि आधा आधा बंटा होता है।
 यदि किसी पुरुष का पूर्ण सम्मान करना होतो उसकी पत्नी का भी सम्मान करना होगा। यदि पत्नी का पूर्ण सम्मान करना है तो उसके पति का भी सम्मान करना होगा। 
इसलिए भारत मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाया जाता है जो साथ में मनाया जाता है। 
आप किसी पेड़ को पानी देना चाहे तो उसके साथ आपको धरती को भी पानी देना होगा क्योंकि पेड़ और धरती आपस में जुड़े हुए है ऐसे ही मातृ पितृ पूजन ही सार्थक है।
कृपया आपको जन्म देनें में,पालन पोषण में दोनों का योगदान रहा है इसलिए मातृ-पितृ दिवस मनाईये। जिसमें दोनों साथ हो।

 पोस्ट पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद। यदि आपको पोस्ट पसन्द आयी होतो अपनी प्रतिक्रिया जरूर व्यक्त करें।
पुनः धन्यवाद।




Wednesday, April 22, 2020

आत्मनिरीक्षण/ Self Enquiry

आत्मनिरीक्षण क्या है?

जब तक हम जीवित रहते हैँ, हर क्षण कार्य में लगे रहते हैं, वे चाहे अच्छे हों या बुरे । प्रत्येक दिन हमने सुबह से लेकर शाम तक क्या-क्या अच्छा और क्या-क्या बुरा कार्य किया और उन्हें करने से हमें वया लाभ और क्या हानि हुईं? हमने क्यब्व-क्या नहीं किया और उसे नहीं करने से क्या-वया लाभ और हानि हमें हुई? यह सबकुछ देखना ही आत्मनिरीक्षण है । इम बात क्रो यूं समझें कि अपने सभी गुगब्ब-दोषों, अच्छाईयों-बुरग़इयों, शुभ-अशुभ विचारों, वाणी और शरीर के कार्यों का स्मरण करना ही आत्मनिरीक्षण है । अपने मन को देखना, अपनी संवेदनाओं क्रो देखना, अपने क्रिया कलापों को देखना और अपनी स्मृतियों क्रो भी देखना, इन सबको साक्षी भाव से देखना आत्म निरीक्षण है । इसके माध्यम से हम अपनी वास्तविक वर्तमान स्थिति का परिचय प्रात करते हैं कि अभी हमृ उत्थान की ओर अग्रसर हो रहे हैं या पता कौ ओंर । एक शिविरार्थी के लिए भी आत्म निरीक्षण के माध्यम से यह जानना जरूरी होता है कि इतनी दूर से शिविर में आकर, इतने अनुशासन में रहते हुए उसने जो तपस्या र्का है, इतना सारा समय अपनी आदर्श दिनचर्या को पूरी करने में लगाया है, तो इससे उसे आज क्या नई उपलब्धि प्राप्त हुई ९" एक छोटा सा व्यापारी जो दिनभर अपना व्यापार करता है, रात को दुकान बंद करने से पहले बो भी यह जरूर देखता है कि मैँने आज कुछ कमाया है या नहीं ? अगर कमाया है तो वो कमाया हुआ धन आज के लिए पर्याप्त था या नहीं ? अथवा आज कुछ घाटा तो नहीं हुआ? जैसे एक व्यापारी अपने लाभ या नुकसान का ध्यान रखता है, वैसे ही एक किसान भी यह देखता है कि फसल पाने हेतु जो बीज उसने बोये हैं, बो ठोक तरह से ऊग रहे हैं या नहीं ? इसी तरह से लौकिक क्षेत्र में भी हर जगह, हर व्यक्ति इस बात कौ विशेष तौर पर देखता है । इस तरीके से अवलोकन करना, देखना, जाँचना, परखना उसके जीवन की सफलता के लिए है । वह अगर दैनिक हिसाबकिताब की जाँच नहीं करेगा, वही-खाते तैयार नहीं करेगा, तो उसके लिये अपने प्रत्येक काम क्रो और अच्छे ढंग से करना संभव ही नहीं होगा । संदेश यही है कि प्रतिदिन 18 घटै काम करने का आउटपुट (प्राप्ति) जाने बिना, उस व्यापारी के किसी भी कार्य में और उसके जीवन में किसी भी प्रकार की कोई प्रगति भी नहीं हो सकेगी ।

व्यापार हो या पढाई, कार्य कोई भी हो, सुचारू रूप से सबका लेखा जोखा आँर मापतौल रखना अति आवश्यक होता है । बिना इसके उसका व्यापार चौपट हो जाएगा । क्योंकि उसे पता ही नहीं चलेगा कि कौन सा व्यापार करने में कितना नुकसान हुआ, और वह नुकसान क्यों हुआ ? जिस प्रकार लौकिक क्षेत्र में प्रगति करने के लिए अपना दैनिक लेखा-जोखा रखना अति आवश्यक है । ठीक इसी तरह से अध्यात्म के क्षेत्र में भी प्रगति करने केलिए स्वयं के द्वारा प्रतिदिन, प्रतिपल किए जा रहे कर्मों का लेखा-जोखा रखना, अपने क्रियाकलापों पर बारीक नज़र रखना, अपने गुण-दोषों, अच्छाई -बुरइं क्रो ढूंढ़ना हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक होता है और इसी को आत्मनिरीक्षण कहते हैं । आत्म निरीक्षण रूपी कसौटी पर स्वयं को कसने पर ही पता चलत है कि इस मानव संसार रूपी व्यापार मंडी में हम ऊँचे उठ रहे है या नीचे गिर रहे है और    तभी हम वास्तविक ऊंचाइयों को छूने केे लिए भी कर सकेंगें।

इस लेख को पढ़ने के लिए आपका बहुँत बहुँत धन्यवाद।

Thursday, April 16, 2020

हम तो अपने दुश्मन को ऐसी सजा देते है।

हम तो अपने दुश्मन को ऐसी सज़ा देते है,हाथ लगाते नहीं नज़रों में गिरा देते है।

तब भी कोई हिमाक़त-ए-जुर्रत करता है, तो ख़ाक में मिला देते है।

🌿🌼 नवसंवत्सर, विक्रम सम्वत- २०८२- संवत्सर का प्रथम मास - चैत्रमास 🌼🌿

  🌿🌼 नवसंवत्सर, विक्रम सम्वत- २०८२- संवत्सर का प्रथम मास - चैत्रमास 🌼🌿 चैत्रमास संवत्सर का प्रथम मास है। सृष्टि के आरम्भमें चन्द्रमा चित...